भारत में हर साल लगभग 1 करोड़ लोग करते हैं विवाह, समझिए भारतीयों के बीच क्यों इतना पॉपुलर है शादी करना?

 


आंकड़े बताते हैं सालाना लाखों की तादाद में लोग शादी के बंधन बंधते हैं, जो देश की सांस्कृतिक विविधता और रीति-रिवाजों की रंगीन तस्वीर पेश करते हैं. हर जाति, धर्म और क्षेत्र की कहानी अलग है. हर शादी समारोह अपनी परंपराओं का अनूठा संगीत गाता है.


पारंपरिक विवाह के साथ-साथ, लव मैरिज का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है. युवा पीढ़ी अपने जीवनसाथी का चुनाव खुद कर रहे हैं. इंटरकास्ट और इंटरफेथ शादियां भी बढ़ रही हैं. हालांकि, इन बदलावों के साथ कुछ चुनौतियां भी आती हैं.


आइए भारत में शादी की संस्कृति में गहराई से उतरने की कोशिश करते हैं. इसके महत्व के बारें में बात करते हैं और जानते हैं ये चलन कैसे आगे बढ़ रहा है.


कितनी शादी होती है भारत में?

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल लगभग 1 करोड़ शादियां होती हैं, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है. हालांकि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के आंकड़ों में थोड़ा अंतर है. ग्रामीण क्षेत्रों में शादी करने वालों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक होती है. वहीं शहर में शिक्षा के बढ़ते महत्व के कारण शादी की उम्र बढ़ रही है.


आंकड़ों के अनुसार, साल 2020 में शादीशुदा भारतीयों की संख्या 45 फीसदी से ज्यादा थी. इसमें 30 से 34 साल के बीच के पुरुष और महिलाओं की आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा था. इसके अलावा 25 से 29 साल के बीच के विवाहित भारतीयों की आबादी का हिस्सा पांच फीसदी से अधिक था.



भारत में हर साल लगभग 1 करोड़ लोग करते हैं विवाह, समझिए भारतीयों के बीच क्यों इतना पॉपुलर है शादी करना?



कितना बड़ा है भारत में शादी-विवाह उद्योग?

शादी-विवाह उद्योग देश में चौथी सबसे बड़ी इंडस्ट्री है. बहुत से लोग शादी को यादगार बनाने के लिए खुले हाथ से खर्च करते हैं. भारत में शादी समारोह पर हर साल करीब 11 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं. साल 2022 में नवंबर और दिसंबर के बीच भारतीयों ने शादियों पर अनुमानित 3.75 लाख करोड़ रुपये खर्च किए थे. ये आंकड़ा पिछले साल से 25 फीसदी ज्यादा है. 2021 में इसी समय तीन लाख करोड़ रुपये खर्च किए गए.


CAIT की रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में 23 नवंबर से 15 दिसंबर के बीच देश में 38 लाख शादियां हुईं. इससे लगभग 4.74 लाख करोड़ रुपये का कारोबार होने का अनुमान है. यानी कि पिछले साल से 1 लाख करोड़ ज्यादा खर्च हुआ.



भारत में हर साल लगभग 1 करोड़ लोग करते हैं विवाह, समझिए भारतीयों के बीच क्यों इतना पॉपुलर है शादी करना?



शादी समारोह में पारंपरिक परंपराएं

भारत में शादी सिर्फ दो व्यक्तियों का मिलन नहीं बल्कि परिवारों और समाज का संगम होता है. कुछ समुदायों में परंपरागत शादी करना अहम माना जाता है जबकि कुछ में आधुनिकता का मेल नजर आता है.


भारतीयों के शादी समारोह में परंपराएं धर्म, जाति और जगह के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन कुछ परंपराए होती हैं जो लगभग सभी शादी समारोह में देखने को मिलती हैं. माता-पिता अहम भूमिका निभाते हैं, रिश्ते तलाशते हैं, रस्में कराते हैं, आशीर्वाद देते हैं. ऐसी ही कुछ आम परंपराएं...


सगाई: यह वह चरण है जहां दो परिवार औपचारिक रूप से शादी का प्रस्ताव स्वीकार करते हैं और विवाह की तारीख तय करते हैं.

मेहंदी: शादी से पहले दूल्हा और दुल्हन के हाथों पर मेहंदी लगाई जाती है.

संगीत: शादी से पहले दोनों परिवारों के सदस्य संगीत और नृत्य के साथ जश्न मनाते हैं.

मंडप: विवाह समारोह आमतौर पर एक मंडप के नीचे होता है, जिसके चारों ओर खंभे होते हैं.

बिदाई: शादी की रस्में पूरी होने के बाद दुल्हन को विदाई दी जाती है और वह अपने नए घर चली जाती है.


धर्म के अनुसार शादी की अलग-अलग परंपराएं


हिंदू धर्म में सात फेरे लेने की मान्यता है, इन फेरों के बाद दूल्हा-दुल्हन जीवनभर के लिए एक हो जाते हैं.

मुस्लिम समुदाय में निकाह के दौरान दूल्हा-दुल्हन तीन बार 'कुबूल है' कहते हैं.

सिख समुदाय में आनंद कारज रस्म में अरदास पढ़ने के बाद दूल्हा-दुल्हन शादी के बंधन में बंधते हैं.

आधुनिक विवाह परंपराएं

भारत की संस्कृति को सदियों से रीति-रिवाजों और परंपराओं से परिभाषित किया गया है. परंपरागत शादी समारोह में परिवार जाति, सामाजिक स्थिति और कुंडली मिलान जैसे कारकों पर ध्यान देते हुए वर और वधू का चयन किया जाता है. हालांकि आधुनिक भारत में हवाएं बदल रही हैं.


आधुनिक भारत में शादी समारोह के प्रति युवा पीढ़ी का नजरिया बदल रहा है. जैसे लव मैरिज, डेस्टिनेशन वेडिंग, छोटी शादियां और इंटरकास्ट मैरिज का दौर आ गया है.


लव मैरिज: युवा जोड़े अब अपने जीवनसाथी का चुनाव खुद ही कर रहे हैं. मतलब लड़का लड़की पहले ही एक दूसरे को अच्छे से समझ लेते हैं और दोनों एक दूसरे से प्यार करने लगते हैं. फिर आपसी सहमति शादी कर लेते हैं, इसे ही लव मैरिज कहा जाता है. हालांकि ये आधुनिक भारत की कोई नई परंपरा नहीं है मगर आज के समय में आम बात है. यह बदलाव शायद सामाजिक-आर्थिक आजादी और शिक्षा के बढ़ते स्तर का परिणाम है.


डेस्टिनेशन वेडिंग: डेस्टिनेशन वेडिंग का ट्रेंड लगातार बढ़ रहा है. कई जोड़े अपने निवास स्थान की बजाय विदेश या किसी दूर रोमांटिक लोकेशन पर जाकर शाही शादी करते हैं. ये शादियां अक्सर किसी पैलेस या फोर्ट में आयोजित होती है जो सभी के लिए एक यादगार अनुभव रहता है.


डेस्टिनेशन वेडिंग के लिए इन दिनों विदेशों में पसंदीदा देश हैं दुबई, आबू धाबी, कतर, मलेशिया, थाईलैंड, वियतनाम, इंडोनेशिया. वहीं भारत में उदयपुर, जयपुर, गोवा, केरल काफी डिमांड में है.


छोटी शादियां: भव्य समारोह और सैकड़ों मेहमानों को बुलाने की बजाय अब कुछ परिवार छोटी शादियों का विकल्प भी चुन रहे हैं. ये शादियां आमतौर पर परिवार और खास दोस्तों को बुलाकर आयोजित की जाती है. छोटी शादियां कम खर्चीली, अधिक किफायती और तनावमुक्त होती हैं. खाना भी कम बर्बाद होता है.


इंटरकास्ट मैरिज: आधुनिक विवाह परंपराओं में शायद सबसे क्रांतिकारी बदलाव इंटरकास्ट मैरिज की बढ़ती स्वीकृति है. जाति और धर्म के आधार पर सामाजिक बाधाएं धीरे-धीरे कम हो रही हैं, जिससे इंटरकास्ट विवाह आम हो रहा है. कुछ परिवार  धर्म, जाति की परवाह किए बिना संबंध को ज्यादा महत्व देते हैं. ये एक बड़ा कदम है.


इंडियन मैरिज सिस्टम की कुछ चुनौतियां 

विवाह जहां एक ओर जीवन भर साथ निभाने का पवित्र बंधन माना जाता है, वहीं दूसरी ओर यह कई सामाजिक चुनौतियों से भी ग्रस्त है. जैसे कि दहेज प्रथा, बाल विवाह, और लैंगिक असमानता.


दहेज प्रथा एक सामाजिक बुराई है जो दशकों से चली आ रही है. इस प्रथा के तहत वर पक्ष की ओर वधू पक्ष से नकद, जेवर, कार या अन्य कीमती सामान की मांग की जाती है. दहेज हत्या, मानसिक उत्पीड़न और सामाजिक बहिष्कार जैसे जघन्य अपराध इस प्रथा की ही उपज हैं. हालांकि दहेज निषेध अधिनियम जैसे कानून बने हुए हैं, फिर भी सामाजिक मानसिकता में बदलाव के अभाव है.


बचपन में ही नाबालिग बच्चों का विवाह कर देना भी भारत में एक गंभीर सामाजिक समस्या है. इसका प्रभाव न केवल शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ता है, बल्कि बच्चे शिक्षा से भी वंचित रह जाते हैं. कम उम्र में शादी करने वाली लड़कियों को मातृत्व जटिलता का सामना भी करना पड़ता है. बाल विवाह रोकथाम अधिनियम के सख्त नियम बनाए गए हैं, इसके बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक दबाव, गरीबी और जागरूकता की कमी के कारण यह प्रथा जारी है.


इसके अलावा शादी समारोह के दौरान जाति और धर्म के आधार पर भेद भी साफ दिखता है. पहले की तुलना में इंटरकास्ट मैरिज का चलन बढ़ा है मगर आज भी इसका विरोध किया जाता है जिससे समुदायों के बीच नफरत पैदा होती है. उच्च जाति और वर्ग के लोगों को विवाह में अधिक तरजीह दी जाती है, जिससे सामाजिक असमानता को बढ़ावा मिलता है. वहीं विवाह पर आर्थिक स्थिति का भी असर पड़ता है क्योंकि दहेज की मांग अक्सर गरीब परिवारों के लिए असहनीय बना देती है.

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