बिहार के भागलपुर, छपरा और राजगीर की हवा क्यों हो गई दिल्ली- मुंबई से ज्यादा जहरीली?

 


भारत में ठंड आने के साथ ही वायु प्रदूषण की स्थिति भी बिगड़ने लगती है. दिल्ली-मुंबई में बढ़ते प्रदूषण के स्तर के बारे में तो हम आए दिन अखबारों में पढ़ते ही रहते हैं. लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि अब छोटे शहरों की हवा भी जानलेवा होती जा रही है. 

दरअसल 6 जनवरी 2024 को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने देश के प्रदूषित शहरों की एक रिपोर्ट जारी की थी. जिसके मुताबिक भारत के 235 में से सिर्फ 11 ऐसे शहर हैं जिसकी हवा की गुणवत्ता 'बेहतर' (0-50 के बीच) स्थिति में है. जबकि 63 शहरों की हवा की गुणवत्ता 'संतोषजनक' यानी एक्यूआई 51-100 के बीच है और 92 शहर ऐसे है जिसकी वायु गुणवत्ता 'मध्यम' 101-200 के बीच है. 

एक सप्ताह पहले ही बिहार के भागलपुर में वायु गुणवत्ता सूचकांक गंभीर स्तर पर पहुंच गया था. इतना ही नहीं यह शहर देश का सबसे प्रदूषित शहर भी बन गया है, जहां एक्यूआई बढ़कर 401 पर पहुंच गया है. 

भागलपुर के बाद देश के दूसरे सबसे प्रदूषित शहर के लिस्ट में है ओडिशा का बालासोर. यहां भी प्रदूषण स्तर बढ़कर एक्यूआई 348 पर पहुंच गया है. तीसरे स्थान पर छपरा (एक्यूआई- 343), राजगीर (एक्यूआई-355), सहरसा (एक्यूआई-376) और श्रीगंगानगर में वायु गुणवत्ता 347 रिकॉर्ड की गई है. 

सबसे साफ हवा वाले शहरों के बारे में भी जान लीजिए 

ऊपर तो हुई देश के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों की बात. लेकिन इसी रिपोर्ट में भारत के ऐसे 11 शहरों के बारे में भी बताया गया है जहां की हवा अभी भी सांस लेने योग्य है. इस शहरों की वायु गुणवत्ता सूचकांक 50 या उससे नीचे यानी 'बेहतर' स्थिति में है. 

बेहतर वायु गुणवत्ता वाले शहरों में सबसे पहले आइजोल का नाम आता है. यहां कि हवा की क्वालिटी एक्यूआई 24 है जिसे बेहतर की कैटेगरी में रखा गया है. इसके अलावा इस लिस्ट में चामराजनगर (एक्यूआई 43), तमिलनाडु का शहर चेंगलपट्टू (एक्यूआई 45), दमोह (एक्यूआई 40), एलूर (एक्यूआई 38), कडपा (एक्यूआई 42), कलबुर्गी (एक्यूआई 47), मदिकेरी 48, शिलांग 48, सिलचर 48 थूथुकुडी 50 को भी शामिल किया गया है. 

भारत की बढ़ रहे प्रदूषण का कारण क्या है

1. शहरीकरण - प्रदूषण का एक मुख्य कारण बढ़ती आबादी और शहरीकरण है. जब किसी शहर की स्थापना की शुरुआत होती है तो उद्योगों को लगाना शुरू किया जाता है और तभी से वहां की हवा खराब होनी शुरू हो जाती है. शहरीकरण की कठोर वास्तविकता ये भी है कि इस प्रक्रिया में कई खूबसूरत घाटियां, पहाड़, हिल स्टेशन और जंगल प्रदूषण के ढेर में बदल जाते हैं.  

इतना ही नहीं शहरी इलाकों में वाहनों का घनत्व ज्यादा है, जिससे निकलने वाला धुआं काफी खतरनाक होता है और ढेर सारी बीमारियों को न्योता देता है. इन धुएं के कारण लोग कैंसर, अस्थमा जैसी जानलेवा बीमारियों से पीड़ित हो रहे हैं. 

2. गाड़ियां और मशीनें- भारत में मोटर, ट्रक, बस, विमान, ट्रैक्टर और अलग-अलग तरह की अनेक मशीने हैं जिसमें डीजल, पेट्रोल, मिट्टी तेल का इस्तेमाल किया जाता है. इन तेलों के जलने से कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन, सीसा जैसे कई जहरीली गैसें वातावरण में फैलती है और वहां की हवा को प्रदूषित करती हैं. 

3. कारखाने- हाल ही में औद्योगीकरण पर बढ़ते फोकस के कारण औद्योगिक अपशिष्ट और उत्सर्जन तेजी से बढ़ रहा है, और ये भी पर्यावरण में प्रदूषण का बड़ा कारण है.

आसान भाषा में समझें तो भारत के दिल्ली मुंबई जैसे शहरों में कई कारखानें है जिसकी चिमनियों से जो धुएं निकलते हैं, उस धुएं में कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड, हाइड्रोजन-फ्लोराइड जैसी हानिकारक गैसें होती हैं. इसके अलावा चिमनियों में से सीसा, पारा, जिंक, कॉपर, कैडमियम आदि के सूक्ष्म कण भी हवा में फैलते हैं जो इंसानी शरीर के लिए काफी हानिकारक भी होता है.

4. धुआं और ग्रिट - कारखानों की चिमनियों और घरेलू ईंधन को जलाने से धुआं निकलता है और ये धुआं हवा के साथ मिलकर वातावरण को जहरीला बनाता है. 

ज्यादा इंडस्ट्री या वाहन नहीं, फिर भी बिहार में क्यों बढ़ रहा प्रदूषण 

बिहार में नदियों के किनारे जो शहर बसा हुआ है वह अन्य शहरों की तुलना में ज्यादा प्रदूषित है. इन शहरों में पटना, भागलपुर, बेगूसराय, हाजीपुर, छपरा, मुंगेर, बक्सर, आरा, समस्तीपुर, कटिहार शामिल हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि नदी किनारे वायु प्रदूषण का सबसे मेन कारण हल्की मिट्टी है. इस मिट्टी के हवा के संपर्क में आने के बाद पीएम10 और पीएम2.5 की मात्रा ज्यादा हो जाती है. 

जानें कैसे नुकसान पहुंचा रहा है प्रदूषण

वायु प्रदूषण में हानिकारक पदार्थ और गैसें मौजूद होते हैं जो हमारे दिमाग तक पहुंचकर उसे नुकसान पहुंचाती हैं. खासकर जो लोग प्रदूषण वाले क्षेत्रों में रहते हैं या काम करते हैं, उनमें अल्जाइमर, डिमेंशिया जैसी भ्रामक/भूलने वाली बीमारियों का खतरा कहीं ज्यादा होचता है.

रिसर्च के मुताबिक यह साबित हो चुका है कि प्रदूषण मस्तिष्क को नुकसान पहुंचाता है और तंत्रिका कोशिकाओं के बीच संचार में बाधा डालता है, जिससे याददाश्त कमजोर होती है और अल्जाइमर जैसी बिमारियां होती हैं. 

वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार के उपाय 

भारत में साल-दर-साल प्रदूषण का स्तर बढ़ता ही जा रहा है. केंद्र सरकार की तरफ इसे नियंत्रित करने के लिए पिछले कुछ सालों में कई तरह के उपाये किए गए है. 

1. वायु (प्रदूषण रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम 1981: यह अधिनियम वातावरण में फैले प्रदूषित हवा को रोकने और उसे नियंत्रित करने के लिए एक राष्ट्रीय स्तर का कानूनी ढांचा प्रदान करता है. 

2. निरंतर परिवेशी वायु गुणवत्ता निगरानी प्रणाली: यह प्रणाली भारत के सभी राज्यों में एयर क्वालिटी की निगरानी करती है और वास्तविक समय में वायु गुणवत्ता डेटा प्रदान करती है.

4. एनईईआरआई द्वारा विकसित ग्रीन क्रैकर्स: ये कम प्रदूषित पटाखे हैं जो पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम हानिकारक है. 

5. अरावली की महान हरी दीवार (Green Wall): केंद्र सरकार द्वारा शुरू क्या गया यह एक विशाल वृक्षारोपण परियोजना है जिसका उद्देश्य अरावली पहाड़ियों में पेड़ लगाना है जिससे दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में वायु प्रदूषण को कम किया जा सके.  इतना ही दिल्ली जैसे कुछ बड़े राज्यों ने पॉल्यूशन से निपटने के लिए स्मॉग टावर्स का भी निर्माण किया है.

क्या होता है वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई), कैसे करता है काम?

वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी एक्यूआई एक तरह का हवा की प्रदूषण मापने वाला थर्मामीटर है. इसके जरिए शहरों की हवा में कितना कार्बन डाइऑक्साइड, कितना ओजोन और कितना नाइट्रोजन डाइऑक्साइड है इसकी मात्रा चेक की जाती है. एक्यूआई से हवा की गुणवत्ता चेक कर उसे शून्य से लेकर 500 तक रीडिंग में दर्शाया जाता है.

हवा में पोल्यूटेंट्स की मात्रा जितनी ज्यादा होगी, वायु सूचकांक का स्तर उतना ही ज्यादा होता है और ये स्तर जितना ज्यादा होता है, हवा उतनी ही खतरनाक होती है.

यानी अगर किसी शहर का एक्यूआई 0 और 50 के बीच है तो उस शहर के एयर क्वालिटी को 'अच्छा' माना जाता है.

अगर यही एयर क्वालिटी 51 और 100 के बीच है तो इसे 'संतोषजनक' माना जाता है

101 और 200 के बीच है यहां की हवा को 'मध्यम' कैटेगरी में रखा जाता है 

201 और 300 के बीच 'खराब'

301 और 400 के बीच 'बेहद खराब'

-401 से 500 के बीच 'गंभीर' श्रेणी में माना जाता है.

हालांकि यहां ये भी जानना जरूरी है कि अलग-अलग देशों का वायु गुणवत्ता सूचकांक वहां मिलने वाले प्रदूषण कारकों के आधार पर अलग अलग होता है. भारत में एक्यूआई को मिनिस्ट्री ऑफ एनवायरनमेंट, फॉरेस्ट और क्लाइमेट चेंज ने लॉन्च किया. इसे 'एक संख्या, एक रंग, एक विवरण' के आधार पर लॉन्च किया गया था.

दरअसल देश में अभी बहुत बड़ी आबादी है जो शिक्षित नहीं है, इसलिए उन्हें प्रदूषण की गंभीरता को समझाने के लिए इसमें रंगों को भी शामिल किया गया.

भारत में एक्यूआई आठ प्रदूषण कारकों (PM10, PM 2.5, NO2, SO2, CO2, O3, NH3 और Pb) के आधार पर तय होती है. पिछले 24 घंटे में इन कारकों मात्रा के आधार पर हवा की गुणवत्ता को बताता है. इसके लिए किसी भी शहर के अलग अलग जगहों पर इसे लगाया जाता है. इसकी रीडिंग के आधार पर लोगों को स्वास्थ्य संबंधी दिशा निर्देश भी जारी किए जाते हैं.

जहरीली हवा से हर साल लाखों लोगों की मौत 

हाल ही में ‘द बीएमजे’ (द ब्रिटिश मेडिकल जर्नल) में एक स्टडी प्रकाशित की गई थी. जिसके अनुसार भारत में वायु प्रदूषण के कारण हर साल 21 लाख 80 हजार लोगों की मौत हो जाती है. इस मामले में चीन के बाद भारत दूसरे स्थान पर है. 

यही स्टडी कहता है उद्योग, बिजली उत्पादन और गाड़ियों में जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल से होने वाले वायु प्रदूषण के कारण दुनियाभर में हर साल लगभग 51 लाख लोगों की मौत होती है.

भारत में हर घंटे करीब 12 मौत

वहीं डब्ल्यूएचओ ने साल 2016 में एक रिपोर्ट जारी की थी जिसके अनुसार, भारत में वायु प्रदूषण से एक घंटे में लगभग 12 मौतें होती हैं. बाहरी और घरेलू वायु प्रदूषण के कारण 2016 में पांच साल से कम उम्र के 1,01,788 बच्चों की मृत्यु हो गई. घर के बाहर की हवा प्रदूषित होने से देश में हर घंटे लगभग सात बच्चे मर जाते हैं और उनमें से आधे से अधिक लड़कियां हैं. 

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